रविवार, 14 मार्च 2010

अलौकिक दोहे -डॉ॰लक्ष्मी नारायण अलौकिक



आप और हम सोचते कि हत्या बडा पाप
पापियॊं की पौथी में तो ऐसा सोचना भी पाप।

युधिष्ठर ने द्रौपदी को कुछ सोचकर दांव पर लगाया।
महाभारत युद्ध बोला शाबास! तूने मुझे सोते से जगाया।

हमारे पास का धन लोगों ने लूटा ,हम लुट गये
जिन लुटेरों के हाथ न लगा वे हमें कूटने में जुट गये।

कुए में गिरकर मरने वाले को उसने रोका ए भाई ठहरजा
स्वर्ग में अच्छी जगह चाहे,मेरे लिये किडनी दान में लिख जा।

कथन भर्तहरी जडी-बूटी से पडे रोगों पर गाज
वहम रोग का इस दुनिया में कोई नहीं इलाज।

उदास बैठी बहू से सास पूछे बेटी बता तेरे क्या हुआ
ह बोली आप सबको मालूम है कि मेरे कुछ नहीं हुआ।
फ़ूफ़े का साला भी बाप और जीजे का साला भी बाप
इस हिसाब से तो सभी के बापों का बहुत बडा प्रताप।




ढोल से पूछा बता न तू अपनी खासियत,बोल कब बताये
ढोल बोला बगैर ठोके पीटे तो मेरा बाप भी नहीं बताये।

भारी राजस्व की प्राप्ति के साथ सरकार में समान हक पब्लिक को मिले
लाटरी सिटम से चुनाव हों सभी और विजेता को घोषित पद मिले।
सिद्धि चाहे उसे सिद्धि मिले प्रसिद्धि चाहे उसे प्रसिद्धि मिले
हम तो चाहें इक मूरा भैंस जिससे अच्छा सा दूध मिले।

पर पुरुष पर नारी से संतुष्टि का चस्का एक मनोरोग है
लग जाए,संभल न पाए तो समझो सर्वनाशी महायोग है।

वोट हमें देना कहने को बहुत उम्मीद वार आये
वोट पडने के दिन हम किसी को नजर नहीं आये।

लीलावती कलावती की सोच उस वक्त गडबडाती नजर आई
पति ईश्वर तो ईश्वर से बडा कौन जिसने नाव डुबाई।
पण्डे ने कहा पाप धोने गंगा के गहरे जल में तू कूद जा
मगर ने कहा पाप धोने की मशीन मेरे पेट में है आ जा।

पूछ रहे बेकार कि उधार कब चुकाओगे
नहीं चुकाएंगे जो तुम जरुरत नहीं बताओगे।

जीवात्मा का भाग्य कोइ लिख रहा यह बडी भूल
कर्म का परिणाम आप ही बन जाता भाग्य का मूल।

कम अक्ली लडकियां जवानी में न संभले और भागे
मुसीबतें एक से एक बढकर स्वागत को आगे।




किसका काम कैसे चल रहा भगवान ही जाने
किसका क्यों अटक रहा यह भी भगवान ही जाने।
(भगवानजी कहां रहते हैं यह कोई न जाने)

इस मतलबी दुनिया से मेरा मन हट गया है
समझाया,समझ गया अब रुपये गिनने में लग गया है।
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